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हरित क्रांति से क्या तात्पर्य है और भारत में हरित क्रांति (What is meant by Green Revolution and Green Revolution in India)

हरित क्रांति से क्या तात्पर्य है और भारत में हरितक्रांति (What is meant by Green Revolution and Green Revolution in India)

हरित क्रांति से क्या तात्पर्य है और भारत में हरित क्रांति


हरितक्रांति से तात्पर्य एक ऐसी कृषि योजना से है जिसमें परम्परागत कृषि प्रणालियों की जगह तकनीक आधारित नवीन कृषि पद्धतियों के माध्यम से खाद्यान उत्पादन में तीव्र वृद्धि करना है। हरितक्रांति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अमेरिका के डॉक्टर विलियम गैड महोदय ने किया था

भारत में इसकी शुरूआत 1966-67 ई. में उस समय की गई थी जब देश में खाद्यान्न संकट अपने चरम पर था तथा चीन एवं पाकिस्तान के युद्धों से आर्थिक स्थिति विपरीत अवस्था में थी। भारत में इस क्रांति के जनक के रूप में एम.एस. स्वामीनाथन को जाना जाता है।

हरितक्रांति की मुख्य विशेषता :-

  • इस क्रांति के उपरान्त विशेषता 5 फसलों गेहूं, चावल, बाजरा, मक्का एवं ज्वार के उन्नत बीजो का प्रयोग प्रारम्भ हुआ। इन बीजो को प्रारम्भिक चरण में मैक्सिको तथा फीलिपीन्स से मंगाया गया था तथा बाद में इसे देश के कृषि अनुसंधानशालाओं में विकसित किया गया।
  • मिट्टी की उर्वता व पोषकताओं में वृद्धि हेतु रसायनिक उर्वरकों के प्रयोग में वृद्धि की गई तथा स्वदेशी उत्पादन के लिए सम्बंधित उद्योगों की स्थापना पर बल दिया गया।
  • सिंचाई के साधनों के नवीनिकरण व वृद्धि पर जोर दिया गया। देश में 'कमाण्ड विकास कार्यक्रम' को प्रारम्भ किया गया जिसका प्रमुख उद्देश्य किसी क्षेत्र विशेष की ऊच्चावचीय संरचनो जल स्रोतो, इत्यादि को ध्यान में रखते हुए नयी सिंचाई योजना का निर्माण करना व पुरानी पड़ी योजनाओं में आनेवाली बाधाओं को दूर कर कृषि हेतु उपयुक्त बनाना। इस काल के दौरान ही देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े बांधों, नहर, तालाब इत्यादि स्रोतों की स्थापना पर जोर दिया गया।
  • फसलों को रोगों से बचाने के लिए कीटनाशक एवं खर-पतवार नाशक दवाओं के प्रयोग पर जोर दिया गया तथा इसके अनुसंधन से संबंधित 'पौध संरक्षण निदेशालय' की स्थापना की गई।
  • आधुनिक कृषि यंत्रों के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए 'कृषि उद्योग निगम' एवं 'कृषि सेवा केन्द्र' जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई।
  • बहुफसली व मिश्रित कृषि को प्रोत्साहन दिया गया।
  • किसानों को आसान किस्तों पर ऋण की सुविधा मुहैया करायी गई।
  • मृदा परिक्षण हेतु प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई ताकि किसान मिट्टी की जांच करवा कर फसलों का यथोचित चुनाव कर सके एवं इसे उर्वर बनाने हेतु प्रक्रिया को अपना सके।
  • जल संभरण क्षेत्र, शुष्क क्षेत्र, मरूस्थलीय क्षेत्र, लवणीय क्षेत्र, बंजर क्षेत्र इत्यादि को कृषि योग्य बनाने हेतु भूमि संरक्षण के विभिन्न कार्यक्रमों को क्रियान्वित किया गया।
  • ग्रामीण विद्युतीकरण को बढ़ावा दिया गया।
  • किसानों को अपने उत्पाद के विपणन हेतु नियंत्रित मंडियों की स्थापना की गई तथा इसके नियंत्रण के लिए 'नैफेड' नामक संस्था की स्थापना की गई। इसके अलावा उचित भंडारण के लिए शीतगृहों की सुविधा पर बल दिया गया।
  • किसानों को फसल की अधिक उत्पादन होने पर कम कीमत पर बेचने की मजबुरी से संरक्षित करने हेतु न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था की गई।
  • भूमि सुधार के विभिन्न कार्यक्रम जैसे- चकबंदी, हदबंदी, बंजरसुधार कार्यक्रम इत्यादि को प्रोत्साहित किया गया तथा इसे कई राज्यों में सफलता भी मिली।
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हरित क्रांति के लाभ :-

  • हरित क्रांति से निसंदेहः खाद्यान्न की उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जैसे- जहाँ 1964-65 में गेहूं का उत्पादन 123 लाख टन हुआ था वहीं 1985-86 में यह बढ़कर 470 लाख टन हो गया एवं वर्तमान में लगभग 850 लाख टन रिकॉर्ड गेहूं का उत्पादन हो रहा है। इसी प्रकार प्रति हेक्टेयर गेहूं का उत्पादन 1964-65 में 916 किलो था वहीं वर्तमान में ये लगभग 2500 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर है।
  • चावल का उत्पादन जहाँ हरित क्रांति के प्रारम्भ के समय 306 लाख टन था वह 1980 - 81 में 536 लाख टन एवं वर्तमान में ये 1000 लाख टन तक पहुंच गया है। अर्थात् इसमें लगभग 225 प्रतिशत की तीव्र वृद्धि हुई।
  • मोटे अनाजों, दालों व तिलहनों पर हरितक्रांति का प्रभाव अपेक्षाकृत कम पड़ा। जहाँ वर्ष 1970-71 में मक्का का 8.5 प्रतिशत, ज्वार का 4.5 प्रतिशत, बाजरा का 15.5 प्रतिशत क्षेत्र उन्नतशील प्रजातियों के अधिन था वह वर्ष 1995-96 तक क्रमश: 58.3 प्रतिशत, 78.9 प्रतिशत, 73.4 प्रतिशत हो गया।
  • उत्पादन में आशातीत वृद्धि से आयात पर निर्भरता खत्म हुई एवं अधिशेष उत्पादन के निर्यात की सुखद स्थिति का निर्माण हुआ। परिणामतः किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरी जिस कारण वे पूंजीवादी खेती हेतु प्रेरित हुए एवं पहले की तुलना में ज्यादा कृषि के विकास में निवेश का जोखिम लेने में सक्षम हुए।
  • कृषि के संरचनात्मक सुविधाओं जैसे- उन्नत बीज, उर्वरक, कृषि यंत्र, कीटनाशक के प्रयोग में वृद्धि से लघु एवं ग्रामीण उद्योगों का विकास संभव हुआ।
  • कृषि के आधुनिककरण से समय की बचत हुई तथा साथ में कृषि दक्षता में वृद्धि हुई। इसके साथ-साथ खाद्य मुल्यों में बेतहाशा वृद्धि पर रोक लगी जिसके कारण सरकार गरीबों को कम मूल्य पर खाद्यान्न उत्पादन कराने हेतु सक्षम हो सकी इत्यादि।
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समस्यायें/दोष :

  • हरितक्रांति का सर्वाधिक लाभ कुछ निश्चित राज्यों जैसे- पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु जैसे राज्यों को प्राप्त हुआ, जबकि बाकि राज्य इसके फायदे से वंचित रहे। इसके पीछे हरितक्रांति की योजनाओं में कमी के साथ-साथ प्रशासनिक व राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी अभाव था एवं इस योजना का एक ही स्वरूप हर एक राज्य समान रूप से लागू कर पाना संभव नहीं था। जिस कारण कई क्षेत्र में इसका प्रभाव नहीं पड़ा।
  • इस क्रांति का सर्वाधिक लाभ मुख्यत: गेहूँ के उत्पादन पर पड़ा जबकि अन्य खाद्यान्न का अपेक्षित विकास नहीं हो सका
  • रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक के अनियंत्रित उपयोग से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित हुई। इसी प्रकार सिंचाई के अनियंत्रित दोहन से लवणीयता व क्षारीयता जैसी समस्या उत्पन्न हुई। पंजाब, हरियाणा जैसे क्षेत्र जो इस क्रांति के बाद देश के अनाज भंडार कहलाते थे, आज उपर्युक्त समस्याओं से ग्रसित है। परिणामतः उत्पादन प्रभावित हुई है।
  • गहन कृषि व फसलों की एक ही प्रजाति की लगातार पैदावार से मृदा में सुक्ष्म पोषण तत्वों जैसे जिंक, लोहा, मैगनीज इत्यादि की कमी उत्पादन को प्रभावित किया।
  • इस क्रांति का नाकारात्मक प्रभाव सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के रूप में भी सामने आया है। जिसके अन्तर्गत प्रादेशिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई है। कम उत्पादक राज्यों से अधिक उत्पादन वाले राज्यों में श्रम का अनियंत्रित विस्थापन हुआ है जिससे क्षेत्रवाद जैसी समस्या भी पनपी है। इसके अलावा इस कृषि क्रांति का लाभ छोटे किसानो तक कम पहुंचा है। आय में विषमता के कारण अंतरा प्रादेशिक असंतुलन एवं बेरोजगारी की स्थिति भी उत्पन्न हुई।

निषकर्षतः

निसंदेहः यह कृषि क्रांति भारत में कृषि उत्पादन के लिए अभुतपूर्व सुधार का द्योतक है जिससे खाद्यान्न संकट तो दूर हुआ ही तथा साथ में सरकार की सामाजिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए अधिशेष कृषि उत्पादन प्राप्त हुई परिणामतः एक कल्याणकारी राज्य की सकारात्मक भावना को बल मिला।

तथापि इसमें कई ऐसी विसंगतियाँ भी थी जिस कारण यह अपने लक्ष्य से भटक गया। इसी कारण वर्तमान में द्वितीय हरितक्रांति प्रारम्भ किया गया है जिसमें इन विसंगतियों को दूर कर यथोचित एवं सर्वागीक कृषि उत्पादन की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है।


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