रहस्यमयी हवेली | एक ऐसा रहस्य जो पूरी दुनिया बदल सकता था | Suspense Thriller Hindi Story
रहस्यमयी हवेली
अध्याय 1 : गाँव का लड़का
झारखंड के एक छोटे से गाँव देवगढ़ में अर्जुन नाम का एक लड़का रहता था। उसकी उम्र लगभग सत्रह साल थी। वह पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन उसकी जिंदगी आसान नहीं थी। उसके पिता एक छोटे किसान थे और माँ घर संभालती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, फिर भी अर्जुन के माता-पिता उसे पढ़ाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते थे।
अर्जुन को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। गाँव के बाकी लड़के जहाँ दिनभर क्रिकेट खेलते या नदी में नहाते, वहीं अर्जुन पुरानी कहानियाँ और रहस्य वाली किताबें पढ़ा करता था। उसे हमेशा लगता था कि दुनिया में बहुत सारे ऐसे राज छिपे हैं जिन्हें लोग जान ही नहीं पाए।
गाँव के बाहर एक पुरानी हवेली थी। लोग उसे “काली हवेली” कहते थे। लगभग पचास साल से वह हवेली खाली पड़ी थी। गाँव वाले कहते थे कि वहाँ रात में अजीब आवाजें आती हैं। कई लोगों ने दावा किया था कि उन्होंने हवेली की टूटी खिड़कियों में किसी सफेद साए को घूमते देखा है।
अर्जुन बचपन से ही उस हवेली के बारे में सुनता आया था। उसकी दादी अक्सर कहती थीं, “उस हवेली के पास मत जाना। वहाँ सिर्फ अँधेरा और बर्बादी है।”
लेकिन अर्जुन डरने वालों में से नहीं था। उसे लगता था कि हर रहस्य के पीछे कोई न कोई सच जरूर होता है।
एक दिन शाम के समय वह अपने दोस्त रवि के साथ खेतों की तरफ घूमने निकला। दूर से हवेली दिखाई दे रही थी। सूरज ढल रहा था और आसमान लाल हो गया था। हवेली उस रोशनी में और भी डरावनी लग रही थी।
रवि ने डरते हुए कहा, “चल वापस चलते हैं। शाम हो गई है।”
अर्जुन मुस्कुराया। “तू हमेशा डरता क्यों रहता है?”
“क्योंकि मुझे अपनी जान प्यारी है,” रवि बोला।
अर्जुन कुछ देर हवेली को देखता रहा। उसके मन में अजीब सी उत्सुकता जाग रही थी। उसी समय हवेली की सबसे ऊपर वाली खिड़की में उसे हल्की सी रोशनी दिखाई दी।
वह चौंक गया।
“रवि, देख!”
रवि ने भी देखा, लेकिन अगले ही पल रोशनी गायब हो गई।
“शायद कोई भ्रम होगा,” रवि बोला, लेकिन उसकी आवाज काँप रही थी।
उस रात अर्जुन को नींद नहीं आई। उसके दिमाग में वही रोशनी घूम रही थी। अगर हवेली खाली थी, तो वहाँ रोशनी कैसे जली?
अगले दिन उसने तय कर लिया कि वह हवेली के अंदर जाकर सच पता करेगा।
अध्याय 2 : हवेली का पहला रहस्य
अगली शाम अर्जुन अकेला हवेली की तरफ निकल पड़ा। उसके हाथ में एक टॉर्च थी और बैग में पानी की बोतल। हवा तेज चल रही थी। पेड़ों की सूखी शाखाएँ डरावनी आवाज कर रही थीं।
हवेली के मुख्य दरवाजे पर जंग लगा हुआ बड़ा ताला लटक रहा था, लेकिन दरवाजे का एक हिस्सा टूटा हुआ था। अर्जुन धीरे से अंदर घुस गया।
अंदर चारों तरफ धूल जमी हुई थी। दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे जो आधे फटे हुए थे। मकड़ी के जाले हर जगह फैले हुए थे। ऐसा लग रहा था जैसे समय यहाँ कई साल पहले रुक गया हो।
अचानक ऊपर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा। लेकिन उसने खुद को संभाला और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि एक कमरा आधा खुला हुआ था। कमरे के अंदर एक पुरानी मेज रखी थी और उस पर एक लाल रंग की डायरी पड़ी थी।
अर्जुन ने डायरी उठाई। उस पर धूल जमी हुई थी। जैसे ही उसने पहला पन्ना खोला, उसमें लिखा था:
“अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो समझ लो कि हवेली का राज तुम्हारे सामने खुलने वाला है।”
अर्जुन की साँसें तेज हो गईं।
डायरी किसी विक्रम सिंह नाम के आदमी की थी, जो इस हवेली का मालिक था। उसमें लिखा था कि हवेली में एक गुप्त तहखाना है जहाँ बहुत बड़ा खजाना छिपा है। लेकिन उस खजाने तक पहुँचने वाला हर इंसान गायब हो गया।
अर्जुन ध्यान से पढ़ ही रहा था कि पीछे से कदमों की आवाज आई।
वह तुरंत पलटा।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
कमरे की खिड़की अचानक जोर से बंद हो गई। हवा और ठंडी हो गई।
अर्जुन डर गया, लेकिन वह भागा नहीं। उसने टॉर्च की रोशनी चारों तरफ घुमाई। तभी उसे दीवार पर एक अजीब निशान दिखाई दिया।
वह निशान एक चाबी जैसा था।
अर्जुन ने हाथ से उस निशान को दबाया। अचानक दीवार धीरे-धीरे खिसकने लगी।
उसके पीछे अँधेरी सीढ़ियाँ दिखाई दीं जो नीचे तहखाने की तरफ जा रही थीं।
अर्जुन का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
वह समझ गया कि अब असली रहस्य शुरू होने वाला है।
अध्याय 3 : तहखाने का डर
अर्जुन धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। नीचे बहुत अँधेरा था। उसकी टॉर्च की रोशनी मुश्किल से रास्ता दिखा रही थी। सीढ़ियाँ काफी लंबी थीं। हर कदम के साथ हवा और ठंडी होती जा रही थी।
नीचे पहुँचकर उसने देखा कि वहाँ एक बड़ा कमरा था। कमरे की दीवारें पत्थर की थीं और बीच में लोहे का एक विशाल दरवाजा था। दरवाजे पर अजीब भाषा में कुछ लिखा हुआ था।
अर्जुन को समझ नहीं आया कि वह क्या है।
तभी पीछे से आवाज आई, “यह दरवाजा मत खोलना।”
अर्जुन डरकर पलटा। उसके सामने एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। उसकी लंबी सफेद दाढ़ी थी और हाथ में लालटेन।
“आप कौन हैं?” अर्जुन ने पूछा।
बूढ़े आदमी ने कहा, “मेरा नाम हरिदास है। मैं इस हवेली की देखभाल करता हूँ।”
“लेकिन गाँव वाले तो कहते हैं कि यहाँ कोई नहीं रहता।”
हरिदास हल्का सा मुस्कुराया। “कई बार सच लोगों की आँखों से छिपा रहता है।”
अर्जुन ने डायरी दिखाई। “इसमें खजाने का जिक्र है। क्या यह सच है?”
हरिदास कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “हाँ, खजाना है। लेकिन वह सोना-चाँदी नहीं, बल्कि एक ऐसा राज है जो पूरी दुनिया बदल सकता है।”
अर्जुन हैरान रह गया।
हरिदास ने बताया कि कई साल पहले हवेली के मालिक विक्रम सिंह एक वैज्ञानिक थे। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनाई थी जो इंसान की यादों को सुरक्षित रख सकती थी। लेकिन कुछ लालची लोगों ने उस मशीन को हथियाने की कोशिश की। उसी संघर्ष में विक्रम सिंह गायब हो गए और हवेली वीरान हो गई।
“तो वह मशीन इस दरवाजे के पीछे है?” अर्जुन ने पूछा।
हरिदास ने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन इसे गलत हाथों में नहीं जाना चाहिए।”
उसी समय ऊपर से किसी के चिल्लाने की आवाज आई।
हरिदास का चेहरा बदल गया।
“वे लोग आ गए,” उसने घबराकर कहा।
“कौन लोग?”
“जो सालों से इस मशीन की तलाश कर रहे हैं।”
अर्जुन समझ गया कि मामला बहुत बड़ा है।
अध्याय 4 : नकाबपोश आदमी
हवेली के ऊपर से भारी कदमों की आवाजें आने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे कई लोग अंदर घुस आए हों।
हरिदास ने जल्दी से अर्जुन को एक कोने में छिपाया। “चुप रहना,” उसने धीरे से कहा।
कुछ ही देर में तीन नकाबपोश आदमी तहखाने में उतरकर आए। उनके हाथों में बंदूकें थीं।
उनका नेता लंबा और ताकतवर आदमी था। उसने चारों तरफ नजर घुमाई और बोला, “हमें पता है कि मशीन यहीं कहीं छिपी है।”
हरिदास सामने आ गया। “तुम लोगों को यहाँ आने का कोई हक नहीं।”
नेता हँसा। “हक ताकत से मिलता है, बूढ़े।”
अर्जुन छिपकर सब देख रहा था। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था।
नकाबपोश आदमी दरवाजे को खोलने की कोशिश करने लगे, लेकिन दरवाजा नहीं खुला।
तभी उनमें से एक आदमी ने हरिदास को पकड़ लिया। “कोड बता, नहीं तो जान से मार देंगे।”
हरिदास चुप रहा।
अर्जुन समझ गया कि अगर उसने कुछ नहीं किया तो हरिदास मुसीबत में पड़ जाएगा।
उसने चुपके से पास पड़ी लोहे की रॉड उठाई और पीछे से एक आदमी पर हमला कर दिया।
अचानक अफरा-तफरी मच गई।
हरिदास ने मौका देखकर लालटेन फेंकी। लालटेन गिरते ही धुआँ फैल गया। अर्जुन और हरिदास तेजी से दूसरी तरफ भागे।
वे एक संकरे रास्ते से होकर तहखाने के दूसरे हिस्से में पहुँच गए।
वहाँ एक छोटा कमरा था। कमरे के बीच में पुरानी मशीन रखी थी। मशीन पर कई तार जुड़े थे और उसके ऊपर काँच का गोल ढाँचा था।
अर्जुन ने पहली बार ऐसी चीज देखी थी।
“यही है वह मशीन,” हरिदास बोला।
तभी मशीन अपने आप चालू हो गई।
कमरे में तेज नीली रोशनी फैल गई।
और अगले ही पल अर्जुन के सामने एक आदमी की तस्वीर उभर आई।
वह विक्रम सिंह थे।
अध्याय 5 : अतीत का संदेश
विक्रम सिंह की तस्वीर हवा में दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई भूत सामने खड़ा हो। लेकिन उनकी आवाज बिल्कुल साफ थी।
“अगर कोई यह संदेश देख रहा है, तो इसका मतलब है कि मैं अब इस दुनिया में नहीं हूँ।”
अर्जुन और हरिदास ध्यान से सुनने लगे।
विक्रम सिंह ने बताया कि उन्होंने ऐसी तकनीक बनाई थी जो इंसान की यादों को रिकॉर्ड कर सकती थी। उनका सपना था कि लोग अपने अनुभव और ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकें।
लेकिन कुछ ताकतवर लोग इस मशीन का इस्तेमाल लोगों के दिमाग को नियंत्रित करने के लिए करना चाहते थे।
“अगर यह मशीन गलत हाथों में गई, तो इंसान अपनी सोचने की आजादी खो देगा,” विक्रम सिंह बोले।
अर्जुन हैरान रह गया।
“इस मशीन को नष्ट कर दो,” विक्रम सिंह की आवाज गूँजी। “यही दुनिया के लिए सबसे सुरक्षित होगा।”
संदेश खत्म होते ही कमरा फिर अँधेरे में डूब गया।
हरिदास की आँखें नम थीं। “मैं सालों से इसी दिन का इंतजार कर रहा था,” उसने कहा।
लेकिन तभी पीछे से ताली बजाने की आवाज आई।
नकाबपोश नेता दरवाजे पर खड़ा था।
“बहुत भावुक कहानी थी,” उसने हँसते हुए कहा। “लेकिन अब यह मशीन हमारी होगी।”
उसने बंदूक अर्जुन की तरफ तान दी।
अर्जुन पहली बार सच में डर गया।
अध्याय 6 : आखिरी फैसला
नकाबपोश आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। अर्जुन और हरिदास पीछे हट गए।
नेता बोला, “तुम लोग समझते नहीं हो। इस मशीन से हम दुनिया बदल सकते हैं।”
हरिदास ने गुस्से में कहा, “तुम दुनिया को गुलाम बनाना चाहते हो।”
नेता हँसा। “गुलाम नहीं, नियंत्रित। अगर लोगों की यादों और सोच को बदला जा सके, तो कोई युद्ध नहीं होगा, कोई विद्रोह नहीं होगा।”
अर्जुन को उसकी बातें डरावनी लगीं।
अचानक अर्जुन की नजर मशीन के पास लगे लाल बटन पर गई। शायद वही मशीन को बंद कर सकता था।
लेकिन वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं था।
नकाबपोश लोग करीब आ रहे थे।
हरिदास ने धीरे से कहा, “अर्जुन, जो सही लगे वही करना।”
अर्जुन ने गहरी साँस ली। फिर अचानक वह दूसरी तरफ भागा। नकाबपोश लोग उसके पीछे दौड़े।
उसी समय हरिदास ने एक भारी लोहे की चेन खींच दी। ऊपर से पत्थर गिरने लगे।
तहखाने में अफरा-तफरी मच गई।
अर्जुन तेजी से मशीन की तरफ भागा और लाल बटन दबा दिया।
अचानक पूरी मशीन काँपने लगी। तेज आवाज होने लगी।
नीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
नकाबपोश नेता चिल्लाया, “नहीं!”
अगले ही पल जोरदार विस्फोट हुआ।
अर्जुन जमीन पर गिर पड़ा। उसकी आँखों के सामने सब धुंधला हो गया।
अध्याय 7 : नई सुबह
जब अर्जुन की आँख खुली, तो वह हवेली के बाहर पड़ा था। सुबह हो चुकी थी। गाँव के कुछ लोग उसके आसपास खड़े थे।
रवि भी वहाँ था। “तू ठीक है?” उसने घबराकर पूछा।
अर्जुन धीरे-धीरे उठ बैठा। उसने पीछे देखा।
काली हवेली पूरी तरह टूट चुकी थी।
ऐसा लग रहा था जैसे वहाँ कभी कुछ था ही नहीं।
“बाकी लोग कहाँ हैं?” अर्जुन ने पूछा।
लेकिन किसी के पास जवाब नहीं था।
हरिदास भी कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने उस जगह को साफ कर दिया। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि हवेली का श्राप खत्म हो गया।
लेकिन अर्जुन जानता था कि वहाँ सिर्फ एक हवेली नहीं थी। वहाँ एक ऐसा रहस्य छिपा था जो दुनिया बदल सकता था।
एक शाम वह अपने कमरे में बैठा था। तभी उसे अपने बैग में कुछ मिला।
वह वही लाल डायरी थी।
उसने धीरे से डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर एक नई लाइन लिखी हुई थी:
“कुछ रहस्य हमेशा रहस्य ही रहने चाहिए।”
अर्जुन मुस्कुराया। उसने डायरी बंद की और खिड़की से बाहर देखने लगा।
सूरज ढल रहा था।
लेकिन इस बार उसे अँधेरा डरावना नहीं लग रहा था।
अध्याय 8 : डायरी का दूसरा भाग
कुछ दिन बीत गए। अर्जुन सामान्य जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसका मन बार-बार उसी हवेली की तरफ चला जाता था। रात को उसे अजीब सपने आते। कभी नीली रोशनी दिखाई देती, कभी हरिदास की आवाज सुनाई देती।
एक रात उसने फिर से लाल डायरी खोली। इस बार डायरी के कुछ पन्ने पहले से अलग दिख रहे थे। जैसे किसी ने नई बातें लिख दी हों।
उसमें लिखा था:
“अगर तुम यहाँ तक पहुँच गए हो, तो समझ लो कि मशीन पूरी तरह नष्ट नहीं हुई।”
अर्जुन चौंक गया। उसने जल्दी-जल्दी बाकी पन्ने पढ़ने शुरू किए।
विक्रम सिंह ने डायरी में लिखा था कि मशीन का एक छोटा हिस्सा अलग जगह छिपाया गया था। उस हिस्से को “मेमोरी कोर” कहा जाता था। उसी में मशीन का असली डेटा सुरक्षित था।
डायरी में एक नक्शा भी बना हुआ था। नक्शा जंगल के अंदर किसी पुराने मंदिर की तरफ इशारा कर रहा था।
अर्जुन समझ गया कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
अगली सुबह वह रवि के पास गया।
“मुझे फिर से तेरी मदद चाहिए,” अर्जुन बोला।
रवि ने तुरंत मना कर दिया। “पिछली बार मैं डर के मारे मर ही गया था।”
लेकिन जब अर्जुन ने डायरी और नक्शे के बारे में बताया, तो रवि भी उत्सुक हो गया।
दोनों ने तय किया कि वे अगले दिन जंगल की तरफ जाएँगे।
अध्याय 9 : जंगल का रास्ता
सुबह-सुबह अर्जुन और रवि जंगल की तरफ निकल पड़े। उनके पास खाने का सामान, पानी और एक कंपास था।
जंगल बहुत घना था। पेड़ों की ऊँची शाखाएँ सूरज की रोशनी को भी रोक रही थीं। चारों तरफ अजीब सी खामोशी थी।
चलते-चलते रवि बोला, “अगर यहाँ सच में कोई खजाना हुआ, तो आधा मेरा।”
अर्जुन हँस पड़ा। “तुझे हमेशा पैसे ही दिखते हैं।”
करीब दो घंटे चलने के बाद उन्हें एक पुराना पत्थर का रास्ता मिला। रास्ता सीधे पहाड़ी की तरफ जा रहा था।
जैसे-जैसे वे आगे बढ़े, उन्हें टूटी हुई मूर्तियाँ दिखाई देने लगीं। लगता था कि कभी यहाँ कोई बड़ा मंदिर रहा होगा।
अचानक रवि रुक गया।
“तूने सुना?” उसने धीमी आवाज में पूछा।
दूर से घंटी बजने जैसी आवाज आ रही थी।
लेकिन वहाँ कोई इंसान नहीं था।
अर्जुन ने हिम्मत करके आगे कदम बढ़ाया। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें एक विशाल पुराना मंदिर दिखाई दिया। मंदिर आधा टूटा हुआ था, लेकिन उसके दरवाजे पर वही निशान बना था जो हवेली की दीवार पर था।
चाबी जैसा निशान।
अर्जुन समझ गया कि यही सही जगह है।
अध्याय 10 : मंदिर का रहस्य
मंदिर के अंदर बहुत अँधेरा था। दीवारों पर पुराने चित्र बने थे। कुछ चित्रों में लोग अजीब मशीनों के सामने खड़े दिखाई दे रहे थे।
“ये सब क्या है?” रवि ने पूछा।
अर्जुन बोला, “शायद विक्रम सिंह ने यह जगह अपने प्रयोगों के लिए इस्तेमाल की होगी।”
मंदिर के बीच में एक बड़ा पत्थर रखा था। उस पर गोल आकार बना हुआ था।
अर्जुन ने डायरी का नक्शा देखा। उसमें लिखा था कि असली रास्ता पत्थर के नीचे है।
दोनों ने मिलकर पत्थर को धक्का दिया। काफी मेहनत के बाद पत्थर थोड़ा खिसका। उसके नीचे सीढ़ियाँ दिखाई दीं।
रवि ने घबराकर कहा, “मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा।”
लेकिन अर्जुन नीचे उतरने लगा। रवि भी मजबूरी में उसके पीछे गया।
नीचे पहुँचकर उन्होंने देखा कि वहाँ एक छोटा कमरा था। कमरे के बीच में काँच का डिब्बा रखा था।
डिब्बे के अंदर नीली रोशनी से चमकती हुई छोटी सी मशीन थी।
“यही मेमोरी कोर होगा,” अर्जुन बोला।
तभी पीछे से आवाज आई।
“बहुत अच्छा काम किया तुम दोनों ने।”
दोनों ने पलटकर देखा।
दरवाजे पर वही नकाबपोश नेता खड़ा था।
वह जिंदा था।
अध्याय 11 : धोखा
रवि डर गया। “यह यहाँ कैसे पहुँचा?”
नकाबपोश नेता मुस्कुराया। “तुम लोगों का पीछा करना मुश्किल नहीं था।”
उसके साथ कई आदमी भी थे।
नेता बोला, “तुमने हमारा काम आसान कर दिया। अब मेमोरी कोर हमें दे दो।”
अर्जुन समझ गया कि वे फँस चुके हैं।
उसी समय रवि धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। अर्जुन ने उसकी तरफ देखा, लेकिन अगले ही पल रवि नकाबपोश लोगों के पास जाकर खड़ा हो गया।
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
“रवि?”
रवि ने नजरें झुका लीं। “माफ करना। उन्होंने मुझे पैसे देने का वादा किया है।”
अर्जुन को विश्वास नहीं हुआ। उसका सबसे अच्छा दोस्त उसे धोखा दे चुका था।
नेता हँसने लगा। “दोस्ती से ज्यादा ताकतवर लालच होता है।”
अर्जुन गुस्से से भर गया। लेकिन वह अकेला था।
नकाबपोश लोग मेमोरी कोर की तरफ बढ़ने लगे।
तभी अचानक कमरे की दीवारों पर लाल रोशनी जलने लगी।
सायरन बजने लगा।
और एक मशीन जैसी आवाज गूँजी:
“अनधिकृत प्रवेश। सुरक्षा प्रणाली सक्रिय।”
अगले ही पल कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।
सब लोग घबरा गए।
अध्याय 12 : मशीन का सच
कमरे की छत से धुआँ निकलने लगा। नकाबपोश लोग दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगे, लेकिन वह नहीं खुला।
अचानक सामने एक स्क्रीन जल उठी। उस पर विक्रम सिंह दिखाई दिए।
“अगर तुम यह देख रहे हो, तो इसका मतलब है कि लालच फिर से इस जगह तक पहुँच चुका है।”
नकाबपोश नेता गुस्से में चिल्लाया, “यह सब बंद करो!”
लेकिन स्क्रीन चलती रही।
विक्रम सिंह बोले, “मेमोरी कोर सिर्फ यादें सुरक्षित नहीं रखता। यह इंसान के दिमाग को पढ़ भी सकता है।”
अर्जुन और बाकी लोग हैरान रह गए।
“जो भी इस मशीन को गलत इरादे से इस्तेमाल करेगा, मशीन उसके सबसे बड़े डर को उसके सामने ला देगी।”
अचानक नकाबपोश नेता चीखने लगा।
वह हवा में किसी चीज को देखकर डर गया था।
“नहीं! दूर रहो!” वह चिल्लाने लगा।
उसके बाकी आदमी भी डरकर इधर-उधर भागने लगे। शायद मशीन उनके दिमाग के डर दिखा रही थी।
रवि काँपने लगा। “मुझे यहाँ से बाहर जाना है!”
अर्जुन ने महसूस किया कि मशीन बहुत खतरनाक थी।
अगर यह गलत हाथों में जाती, तो पूरी दुनिया के लिए खतरा बन सकती थी।
अध्याय 13 : दोस्ती की कीमत
कमरे में अफरा-तफरी मची हुई थी। नकाबपोश लोग अपने डर से पागल हो रहे थे। कोई चीख रहा था, कोई दीवार से टकरा रहा था।
रवि जमीन पर बैठ गया। उसकी आँखों में आँसू थे।
“मैंने गलती कर दी,” उसने कहा।
अर्जुन उसके पास गया। “अभी पछताने का समय नहीं है। हमें यहाँ से निकलना होगा।”
दोनों ने मिलकर दरवाजे को खोलने की कोशिश की, लेकिन वह बहुत मजबूत था।
तभी अर्जुन की नजर स्क्रीन के नीचे बने एक छोटे पैनल पर गई। उसमें कुछ बटन थे।
उसने अंदाज से एक बटन दबाया।
अचानक मशीन की आवाज बंद हो गई। लाल रोशनी भी धीमी पड़ने लगी।
स्क्रीन पर एक आखिरी संदेश दिखाई दिया:
“सिर्फ वही इंसान इस शक्ति को नियंत्रित कर सकता है जिसके दिल में लालच नहीं है।”
अर्जुन ने बिना देर किए मेमोरी कोर उठाया।
तभी नकाबपोश नेता फिर से उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखें गुस्से से लाल थीं।
“वह मशीन मुझे दे दो!”
वह अर्जुन की तरफ दौड़ा।
लेकिन इस बार रवि बीच में आ गया।
नेता ने उसे जोर से धक्का दिया। रवि पत्थर से टकराकर गिर पड़ा।
अर्जुन गुस्से में नेता से भिड़ गया। दोनों के बीच लड़ाई शुरू हो गई।
काफी संघर्ष के बाद अर्जुन ने नेता को नीचे गिरा दिया। उसी समय ऊपर से पत्थर टूटकर गिरने लगे।
मंदिर हिल रहा था।
लेखक : रंजन कुमार शर्मा


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